Friday, January 31, 2014

Édouard Manet's Rochefort’s Escape



Édouard Manet
Rochefort’s Escape (L’Evasion de Rochefort), c. 1881, oil on canvas, 80 x 73 cm, Musée d’Orsay.
Virulently opposed to the imperial regime, Victor Henri Rochefort founded a political newspaper, La Lanterne, in 1868. The newspaper, which was published in Brussels, was soon banned. In 1873 the journalist was sentenced to prison for his role during the Commune. His spectacular, swashbuckling escape by sea, in 1874, inspired Manet to paint this composition, six years after the event.

Thursday, January 23, 2014

मनुष्य तो नदियों के समान होते हैं

यह मिथ्या विश्वास बहुत प्रचलित है कि हर मनुष्य में कोई न कोई गुण होता है: किसी में दयालुता है, किसी में निर्दयता, कोई बुद्धिमान है तो कोई बेवकूफ, कोई चुस्त है तो कोई सुस्त। लेकिन वास्तव में लोग ऐसे नहीं होते। हम यह कह सकते हैं कि एक मनुष्य का व्यवहार अधिकतर दयालुता का होता है, निर्दयता का कम, वह अधिकतर सूझ बुझ से काम लेता है, बेवकूफियां कम करता है, अधिकतर चुस्त रहता है, सुस्त कम। या हम इसके उलट कह सकते हैं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि एक आदमी दयालु या बुद्धिमान है, और दूसरा बुरा या मूर्ख है। लेकिन फिर भी हम लोगों को हमेशा इसी तरह श्रेणियों में बांटते रहते हैं। और यह सर्वथा असत्य है। मनुष्य तो नदियों के समान होते हैं। सभी नदियों में एक सा ही जल बहता है। लेकिन प्रत्येक नदी का पाट किसी जगह पर तंग है, कहीं पर वह तेज़ बहने लगती है, कहीं पर सुस्त हो जाती, कहीं अधिक चौड़ी, किसी जगह पर उसका पानी  साफ़ है, तो किसी जगह गंदला, कहीं पर ठंडा तो कहीं पर गरम। यही स्तिथि मनुष्यों की भी है। 
तोल्स्तोय 
(पुनरुत्थान)

Thursday, January 16, 2014

what do we teach our children?

Each second we live is a new and unique moment of the universe, a moment that will never be again. And what do we teach our children? We teach them that two and two make four, and that Paris is the capital of France. When will we also teach them what they are? We should say to each of them: Do you know what you are? You are a marvel. You are unique. In all the years that have passed, there has never been another child like you. Your legs, your arms, your clever fingers, the way you move. You may become a Shakespeare, a Michelangelo, a Beethoven. You have the capacity for anything. Yes, you are a marvel. 
And when you grow up, can you then harm another who is, like you, a marvel? You must work, we must all work, to make the world worthy of its children.


Pablo Picasso

Wednesday, January 15, 2014

रंग और उम्मीदों की कुछ बातें

उस समय के स्वप्न अभी भी देखे जाते थे,
रंग जब प्रकट करेंगे,
न सिर्फ रोशनी को जो चीज़ों से निकलती है
बल्कि उस रोशनी को भी
जो कलाकार के दिमाग में निवास करती है।
और तब भी हम असंतुष्ट होंगे
और बड़बड़ाएंगे कुछ वैसा ही,
खुशमिजाज़ी के साथ,
जैसा पाब्लो पिकासो ने कहा था-
"वे तुम्हें हज़ारों किस्म के हरे बेचेंगे।
वेरोनीज़ हरा और एमराल्ड हरा और कैडमियम हरा और 
हर किस्म का हरा,
जिसे तुम पसंद करोगे, पर वह खास किस्म का हरा 
कत्तई नहीं।"
और जीवन में रंग होंगे
और रोशनी और गर्माहट
और इन सबको और अधिक पाने की चाहत।
रंग तब अर्थों से दूषित नहीं होंगे
न बंधे होंगे किसी रूपकार से
और वे हज़ारों तरीकों से गुफ्तगू करेंगे
आत्मा के साथ
जैसा कभी सोचा था ऑस्कर वाइल्ड ने।

"रंग अचेतन की कुंजी"-
जुंग शायद ठीक ही कहता था,
कि हम इस समय रंगों के बारे में इतनी बातें कर बैठे
जब नयी सदी के तीन वर्ष बीत चुके हैं
और नए रूपों में आयी थीं जो पुरानी आपदाएं,
वे पुरातन-आदिम आशाओं की
नयी फसल की बुवाई के लिए
ज़मीन तैयार कर रही हैं।
फिर भी हममें से हर एक के पास हैं
कुछ निराशाएं,
हम, जो कभी भी हिम्मत नहीं हारे थे पूरी तरह
और जो लगातार स्मृति और स्वप्न से
बुनते थे रहे थे नयी परियोजनाएं।
हाँ, हमारी भी थीं कुछ निराशाएं।
आखिर में, जहाँ तक मेरी अपनी बात है,
लोगों को मैंने हमेशा आशाओं के बारे में बताया
और अपनी थोड़ी सी निराशा को
यहाँ-वहाँ, कविताओं के बीच
छुपाने की कोशिश की
और वह कोशिश देख ली गयी
और मैंने पाया कि
लोगों के पास हैं अक्षय आशाएँ
और यह भी कि
वे मुझे प्यार करते हैं।

कात्यायनी
जनवरी, 2004