Wednesday, March 29, 2023

टूटे ख्वाबों का तलछट

 


संशय नींद में घुलता रहा। 

सपनों को खाता रहा। 

लोहे के संकल्पों में अनिर्णय का जंग लग गया। 

सपने साकार हो भी खुद का निषेध कर लेते हैं 

या उन्हें संशय, अनिर्णय, अधूरे प्रयास और आलस खा नष्ट कर देते हैं। 

सपने पेड़ हैं, जंगल हैं, बादल हैं और कम्युनिज्म है। 

वक़्त की धारा बन जाते हैं सपने साकार हो या टूटकर मिट्टी में मिल जाते हैं। 


वक़्त की नदी इतिहास के केनवास पर रचती है भूदृश्य। 

इस नदी की तलहटी में जमे हैं टूटे ख़्वाब। 

केवल टूटे ख़्वाब ही नहीं स्मृतियाँ भी नदियों की तलहटी में जमती रही हैं। 

यह तलछट पहाडों, जीव जंतुओं और वनस्पति के अतीत और उनके पदार्थों से बना है। 

यह तलछट भी तय करता है नदी के प्रवाह और उसकी दिशा को। 


नष्ट तो गर्वीली चट्टानें भी होती हैं और मुरझाई शाखाएँ भी, 

नँगे तने और उसपर निचाट हो चुके चील के घोसले भी, 

हर किसी के नष्ट होने में ही उनका अर्थ है। 

पर कौन कैसे नष्ट हो यह अलग होता है, 

फैक्टरी की मशीन का लोहा भी घिसता है और जंग लगा 

 बेकार पुरजा भी। 

शरीर का हर अणु देदीप्यमान हो उठे या आदतों का गुलाम हो बीमार हो जाए। नष्ट तो यह भी होता है। 

सपनों, संकल्पों और इच्छाओं की तरह ही। 

Saturday, March 11, 2023

सच को सामने लाना होता है

 एक अँधेरे सीलन भरे कमरे में लेटा हूँ

सर दर्द और आँखों में जलन है। 

रोशनी की तीखी रेखाएँ खिड़की के आकार को उभार रही। 

अँधेरे में ही रोशनी का पथ दिख रहा

और वस्तुओं को उनका आकार मिल रहा। 

यूक्लिड और आइंस्टाइन भी इस पथ को और वस्तुओं के आकारों को ही अवलोकित करते रहे। 

राजनीतिक दिशा भी इस तरह ही अवलोकित होती है 

पीढ़ियों के संघर्षों से। 

सच निखरता है और उबरता है संघर्षों से ही। 

सच उबरता है कमजोर संकल्पों और

अधूरी इच्छाओं से खुद को अलग करता हुआ।

 

डॉक्टर कहता है आँख को दिमाग से जोड़ने वाली तंत्रिका 

घिस गयी है। 

क्या पूरे समाज की? 

चश्में लगाए  तो बहुत से लोग हैं 

और नज़र बदलने के चश्मे भरे हैं बाज़ार में। 

फिर भी रोशनी की तीखी लकीरें, उनका वक्र क्यों नहीं दिखता? 

सच क्यों नहीं दिखता? 

ये चश्मे सच न देखने के लिए ही बने हैं। 


रात के चमकते तारे, घुम्मकड ग्रह और चाँद 

सच्चे हैं। 

गेलिलियो की पड़ताल इसे पुष्ट करती है। 

आइंस्टाईन के प्रयोग इसे सिद्ध करते हैं। 

सच को उबारना होता है। 

उसकी पड़ताल करनी होती है। 


और इस तरह ही 

भूख, बेरोज़गारी और मुनाफ़े के सौदे भी नहीं दिखते, 

इन्हें भी दिखाना होता है। 

सच को बाहर लाना होता है।

Thursday, March 9, 2023

तीन रेखा चित्र

 


आत्मा में सुराख है

नैतिकता का बुरादा आसपास बिखरा है। 

गुलाब, ऑर्किड और बागन्विलिया से सजा हुआ है आँगन

पर मनहूसियत की बद्बु दूर नहीं होती। 


आत्मा पर कई पैबंद हैं, कई परते हैं

झूठ के गोंद के डब्बे का ढक्कन उल्टा पड़ा है

बड़े कमरे में पर्दे हैं काले और एक बड़ा लाल काँच का झूमर लटका है, रोशनी कम है

पर पाखण्ड न दिखे ऐसा हो नहीं पाता।   


नज़र को घुन लगी है

ढेर सारे विचारों के चश्मे हैं

किताबों की मीनारें हैं एक नदी के किनारे

चाँद के टुकड़े बिखर गिरते रहते हैं खून की नदी में, 

व्यवहार से ज्ञान कटा रहता है।