Thursday, April 2, 2020

रोटी का हिसाब

स्‍कैच : वारूणी
चांद का एक और टुकड़ा
टूटकर खून की नदी में जा गिरा
घुन खाया चांद परिक्रमा करता रहा धरती की,
सपने टूटते रहे
धरती की गोद में बह रही है
खून की नदी,
कितने ही सपने इसमें डूब चुके हैं,


मां का प्यारा बेटा भूखा है,
बेबस हो वह रोटी की गोलाई और रोटी ढूंढता है,
सपने में रोटी पर मां की उंगलियों के निशान ढूंढता है,

उसकी मां के पैरों से खून रिस रहा था
वह गुजर गई 300 किलोमीटर चलने के बाद
रोटी नहीं बना पाई बेटे के लिए,

रोटी नहीं है बस आंसू और घुटन है
सपनों के चांद को घुन लगी हुई है,
उसी चांद को जो मां की रोटी की गोलाई था,

कितने ही सपने इस नदी में डूब चुके हैं
रोटी की गोलाई खो चुका चांद
घुमता रहा धरती के चारों ओर

सपनों के बिखरे टुकड़ों ने नदी का खून सोख लिया है,
एक रासायनिक क्रिया से आंसू और घुटन में खौलकर
ये इस्‍पात में ढल जाते हैं,

बच्चों के सपने कुत्ते नहीं नोच सकते,
खून और इस्‍पात के वेग में
एक दिन बहा ले जाएगी यह नदी
सभी रोटी छिनने वालों को।
-सनी

Tuesday, August 20, 2019

शिखरों तक जाने के लिए..

कौवा-उड़ान दूरियाँ तय करके
सम्भव नहीं
इन शिखरों तक पहुँच पाना ।

इन तक पहुँचने की
दुर्गम, कठिन, सर्पिल
चढाव-उतार भरी
राहों को जानना होगा ।

यात्राओं के लम्बे अनुभव
होने चाहिए --
सफल और असफल दोनों ही,
एकदम ज़िन्दगी की तरह 
चाहे वह आदमी की हो
या फिर किसी कौम की ।

- शशि प्रकाश

Friday, July 19, 2019

हमें अपने लोगों के बीच होना है।

ये समय है कि
वातानुकूलित परिवेश-अनुकूलित
गंजी-तुंदियल या छैल-छबीली वाम विद्वताओं से
अलग करें हम अपने आप को,
संस्‍कृति के सेानागाछी दलालाें के साथ
मण्‍डी हाउस या इण्डियन इण्‍टरनेशनल सेण्‍टर में काफ़ी पीने का लम्‍पट-बीमार मोह त्‍यागें,
हमें
निश्‍चय ही,
निश्‍चय ही,
निश्‍चय ही,
अपने लोगों के बीच होना है।
हमें उनके साथ एक यात्रा करनी है
प्रतिरक्षा से दुर्द्धर्ष प्रतिरोध तक।
इस फ़ौरी काम के बाद भी
हमें  सजग रहना होगा।
ये हमलावर लौटेंगे बार-बार आगे भी, क्‍योंकि
विनाश और मृत्‍यु के ये उन्‍मादी दूत,
पीले बीमार चेहरों की भीड़ लिए अपने पीछे
चमकते चेहरे वाले ये लोग ही हैं
इस तंत्र की आखिरी सुरक्षा पंक्ति।
-कात्‍यायनी
(आह मेरे लोगो! ओ मेरे लोगो!)



Friday, July 12, 2019

Accumulate! Accumulate!!

‘Accumulate, accumulate! That is Moses and the prophets … Accumulation for accumulation’s sake, production for production’s sake’
Capital is dead labor, which, vampire-like, lives only by sucking living labor, and lives the more, the more labor it sucks.
Read more at https://www.brainyquote.com/quotes/karl_marx_157949
 'Capital is dead labor, which, vampire-like, lives only by sucking living labor, and lives the more, the more labor it sucks.'
 -Marx


Thursday, July 11, 2019

I never knew I loved the cosmos

I just remembered the stars
I love them too
whether I'm floored watching them from below
or whether I'm flying at their side

I have some questions for the cosmonauts
were the stars much bigger
did they look like huge jewels on black velvet
or apricots on orange
did you feel proud to get closer to the stars
I saw color photos of the cosmos in Ogonek magazine now don't
be upset comrades but nonfigurative shall we say or abstract
well some of them looked just like such paintings which is to
say they were terribly figurative and concrete
my heart was in my mouth looking at them
they are our endless desire to grasp things
seeing them I could even think of death and not feel at all sad
I never knew I loved the cosmos...

Things I didn't know I loved
Nazim Hikmet

Tuesday, June 4, 2019

बस यही अपना...

एक परदा रोशनी का
एक चादर उदासी की
एक गठरी भूल-चूकों की
एक दरवाज़ा स्‍मरण का
एक आमंत्रण समय का
एक अनुभव निकटता का
बस यही निज का रहा।
शेष सब साझा हुआ
सफ़र में जो साथ
उन सबका हुआ।
-कात्‍यायनी (2006)

Saturday, May 25, 2019

अविजित फिर भी

विजित शिखर हैं
अविजित फिर भी
उन्नतशिर
उत्प्रेरण देते
आमंत्रण देते
फिर-फिर आरोहण को।
हम क्यों हारें?
नये-नये अभियानों की
योजना बनायें ।

-शशि प्रकाश