Thursday, December 8, 2016

Lenin could not live any other way..

 Ilyich told the young people that it was necessary for them to devote all their work, all their efforts to the common cause.
And Lenin's own life was a model of how this should be done. Ilyich could not live any other way, he did not know how to. But he was not an ascetic; he loved skating and fast cycling, mountain-climbing and hunting; he loved music and life in all its many-sided beauty; he loved his comrades, loved people in general. Everyone knows of his simplicity, his merry, infectious laughter. But everything about him was subordinated to the one thing--the struggle for a bright, enlightened, prosperous life of meaning and happiness for all. And nothing gladdened him so much as the successes achieved in this struggle. The personal side of him merged naturally with his social activity....


Wednesday, December 7, 2016

The beggars

I am skirting a high, mouldering wall, trudging through the fine dust. 
Several other people are walking alone. A breeze springs up and above the wall the branches of tall trees, their leaves still unwithered, are stirring over my head.
A breeze springs up, and dust is everywhere.
A child begs from me. He is wearing lined clothes like others and does not look unhappy, yet he blocks my way to kowtow and whines as he follows me.
I dislike his voice, his manner. I detest his lack of sadness, as if his were some game. I am disgusted by the way he follows me, whining.
I walk on. Several other people are walking alone. A breeze springs up, and dust is everywhere.
A child begs from me. He is wearing lined clothes like others and does not look unhappy, but he is dumb. HE stretches out his hand to me in dumb show.
I detest this dumb show of his. Besides, he may not be dumb; this may just be his way of begging
I do not give him alms. I have no wish to give alms. I stand above those alms-givers. For him I have only disgust, suspicion and hate.
I am skirting a tumble-down, mud wall. Broken bricks have been piled in the gap, and beyond the wall is nothing. A breeze springs up, sending the autumn chill through my lined gown, and dust is everywhere.
I wonder what method I should use in begging. In what voice should I speak? What dumb show should I use if pretending to be dumb? . . .
Several other people are walking alone.
I shall receive no alms, not even the wish to give alms.
I shall receive the disgust, suspicion and hate of those who consider themselves above the alms-givers.
I shall beg with inactivity and silence.  . . .
I shall at last receive nothingness.
A breeze springs up, dust is everywhere. Several other people are walking alone.
Dust, dust. . . .
. . . . . . . . . . . . . .
Dust. . . .

September 24, 1924
Lu Shun

Tuesday, December 6, 2016

दिशा है सामने एक धुंधली पथरेखा की तरह

 दिशा है सामने एक धुँधली पथरेखा की तरह
और लगातार स्‍पष्‍ट होती दृष्टि भी ।
चीज़ों को इस हद तक पहचाना जा सकता है
कि आशाओं का स्रोत अक्षय रहे
लेकिन फिर भी बहुतेरी समस्‍याएँ हैं
नित नई आती हुई और कुछ अतीत की विरासत भी,
कि नया अभियान नहीं बन पा रहा है ऊर्जस्‍वी, गतिमान ।

अभी भी आस-पास हैं झूठे कमज़ोर संकल्‍प
और खोखले वायदे,
और अविश्‍वास,
और पुराने मताग्रह और पुरानी आदतें,
और भ्रमित करने वाले अप्रत्‍याशित बदलाव भी,
जो तुम्‍हें लगभग अकेला कर देती हैं
और भीषण तनाव पैदा करती हैं तुम्‍हारे भीतर,
ज्‍यों धनुष की प्रत्‍यंचा की तरह
खिंच गई हो मस्तिष्‍क की एक-एक शिरा ।
तुम लौटते हो फिर-फिर
अपने एकान्‍त, उदासियों, अनिद्रा भरी रातों
और घुटन भरे अमूर्तनों के पास,
लेकिन गुफा में घुसते एकाकी योगी की तरह नहीं
बल्कि अपने खाली डोलों को लेकर
कुएँ में उतरती उस रहट की तरह
जो पानी लेकर ऊपर आती है
और डोलों को चुण्‍डे में उलट देती है ।

मानचित्र तैयार है लगभग यात्रा-पथ का,
लेकिन कड़वी पराजयों से उपजी दार्शनिकताओं,
अतृप्तियों-अधूरेपन से जन्‍मी विकृतियों,
पुरातन और नूतन कूपमण्‍डूकताओं,
आसमानी आभा वाली आध्‍यात्मिक वंचनाओं,
शयनकक्षों में रखी गई
पिस्‍तौलों और विष के प्‍यालों से भरे
हमारे इस विचित्र विकट समय में
चीज़ें फिर भी काफ़ी कठिन हैं।
चन्‍द राहत या सुकून के दिन आते भी हैं
तो देखते-देखते यूँ बीत जाते हैं
जैसे वीरान खेतों के बीच से
भागती नीलगायों का एक झुण्‍ड गुज़र जाए ।
(स्वगत कविता का अंश)

Tuesday, May 10, 2016

Regarding Art

Sometimes, I, too, tell the ah's  of my heart one by one  like the blood-red beads  of a ruby rosary strung  on strands of golden hair!  But my  poetry's muse  takes to the air  on wings made of steel  like the I-beams  of my suspension bridges!  I don't pretend  the nightingale's lament  to the rose isn't easy on the ears...  But the language  that really speaks to me  are Beethoven sonatas played  on copper, iron, wood, bone, and catgut... 
You can "have"  galloping off  in a cloud of dust!  Me, I wouldn't trade  for the purest-bred  Arabian steed  the sixth mph  of my iron horse  running on iron tracks! 
Sometimes my eye is caught like a big dumb fly  by the masterly spider webs in the corners of my room.  But I really look up  to the seventy-seven-story, reinforced-concrete mountains  my blue-shirted builders create!  Were I to meet  the male beauty  "young Adonis, god of Byblos,"  on a bridge, I'd probably never notice;  but I can't help staring into my philosopher's glassy eyes  or my fireman's square face  red as a sweating sun! 

Though I can smoke  third-class cigarettes filled  on my electric workbenches,  I can't roll tobacco - even the finest-  in paper by hand and smoke it!  I didn't --  "wouldn't" -- trade  my wife dressed in her leather cap and jacket  for Eve's nakedness!  Maybe I don't have a "poetic soul"?  What can I do  when I love my own children  more  than mother Nature's!

-Nazim Hikmet

Wednesday, February 24, 2016

Made in Bondage (vinculis faciebat)

(The Trout, 1872, Gustave Courbet)

"When I am dead, let it be said of me: 'He belonged to no school, to no church, to no institution, to no academy, least of all to any regime except the regime of liberty."

हम समय के युद्धबन्दी हैं

(अमेरिकन ट्रैजेडी, फिलिप एवेरगूड )
हम समय के युद्धबन्दी हैं
युद्ध तो लेकिन अभी हारे नहीं हैं हम ।
लालिमा है क्षीण पूरब की
पर सुबह के बुझते हुए तारे नहीं हैं हम ।
हम समय के युद्धबन्दी हैं...

सच यही, हाँ, यही सच है
मोर्चे कुछ हारकर पीछे हटे हैं हम
जंग में लेकिन डटे हैं, हाँ, डटे हैं हम !
हम समय के युद्धबन्दी हैं...

बुर्ज कुछ तोड़े थे हमने
दुर्ग पूँजी का मगर टूटा नहीं था !
कुछ मशालें जीत की हमने जलायी थीं
सवेरा पर तमस के व्यूह से छूटा नहीं था ।
नहीं थे इसके भरम में हम !
हम समय के युद्धबन्दी हैं...

चलो, अब समय के इस लौह कारागार को तोड़ें
चलो, फिर जिन्दगी की धार अपनी शक्ति से मोड़ें
पराजय से सबक लें, फिर जुटें, आगे बढ़ें फिर हम !
हम समय के युद्धबन्दी हैं...

न्याय के इस महाकाव्यात्मक समर में
हो पराजित सत्य चाहे बार-बार
जीत अन्तिम उसी की होगी
आज फिर यह घोषणा करते हैं हम !
हम समय के युद्धबन्दी हैं...

Tuesday, February 23, 2016

प्रोसेशन ('अँधेरे में' कविता का अंश )

(फासिस्ट कम्पनी ,1943 , फिलिप एवेरगूड )
निस्तब्ध नगर के मध्य-रात्रि-अँधेरे में सुनसान 
किसी दूर बैण्ड की दबी हुई क्रमागत तान-धुन, 
मन्द-तार उच्च-निम्न स्वर-स्वप्न, 
उदास-उदास ध्वनि-तरंगें हैं गम्भीर, 
दीर्घ लहरियाँ!! 
गैलरी में जाता हूँ, देखता हूँ रास्ता 
वह कोलतार-पथ अथवा 
मरी हुई खिंची हुई कोई काली जिह्वा 
बिजली के द्युतिमान दिये या 
मरे हुए दाँतों का चमकदार नमूना!! 

किन्तु दूर सड़क के उस छोर 
शीत-भरे थर्राते तारों के अँधियाले तल में 
नील तेज-उद्भास 
पास-पास पास-पास 
आ रहा इस ओर! 
दबी हुई गम्भीर स्वर-स्वप्न-तरंगें, 
उदास तान-धुन 
समीप आ रहा!! 

और, अब 
गैस-लाइट-पाँतों की बिन्दुएँ छिटकीं, 
बीचों-बीच उनके 
साँवले जुलूस-सा क्या-कुछ दीखता!! 

और अब 
गैस-लाइट-निलाई में रँगे हुए अपार्थिव चेहरे, 
उनके पीछे काले-काले बलवान् घोड़ों का जत्था 
घना व डरावना अवचेतन ही 
जुलूस में चलता। 
क्या शोभा-यात्रा 
किसी मृत्यु दल की? 

दोनों ओर, नीली गैस-लाइट-पाँत 
रही जल, रही जल। 
नींद में खोये हुए शहर की गहन अवचेतना में 
हलचल, पाताली तल में 
चमकदार साँपों की उड़ती हुई लगातार 
लकीरों की वारदात!! 
सब सोये हुए हैं। 
लेकिन, मैं जाग रहा, देख रहा 
रोमांचकारी वह जादुई करामात!! 

विचित्र प्रोसेशन, 
गम्भीर क्वीक मार्च.... 
कलाबत्तूवाला काला ज़रीदार ड्रेस पहने 
चमकदार बैण्ड-दल-- 
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति 
आँतों के जाल से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर 
गम्भीर गीत-स्वप्न-तरंगें 
उभारते रहते, 
ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर। 
बैण्ड के लोगों के चेहरे 
मिलते हैं मेरे देखे हुओं-से 
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार 
इसी नगर के!! 
बड़े-बड़े नाम अरे कैसे शामिल हो गये इस बैण्ड-दल में! 
उनके पीछे चल रहा 
संगीत नोकों का चमकता जंगल, 
चल रही पदचाप, ताल-बद्ध दीर्घ पाँत 
टेंक-दल, मोर्टार, ऑर्टिलरी, सन्नद्ध, 
धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना, 
सैनिकों के पथराये चेहरे 
चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए गहरे! 
शायद, मैंने उन्हे पहले भी तो कहीं देखा था। 
शायद, उनमें कई परिचित!! 
उनके पीछे यह क्या!! 
काले-काले घोड़ों पर ख़ाकी मिलिट्री ड्रेस, 
चेहरे का आधा भाग सिन्दूरी-गेरुआ 
आधा भाग कोलतारी भैरव, 
कन्धे से कमर तक कारतूसी बेल्ट है तिरछा। 
कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तोल, 
रोष-भरी एकाग्रदृष्टि में धार है, 
कर्नल, बिग्रेडियर, जनरल, मॉर्शल 
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष 
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे से लगते, 
उनके चित्र समाचारपत्रों में छपे थे, 
उनके लेख देखे थे, 
यहाँ तक कि कविताएँ पढ़ी थीं 
भई वाह! 
उनमें कई प्रकाण्ड आलोचक, विचारक जगमगाते कवि-गण 
मन्त्री भी, उद्योगपति और विद्वान 
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात 
डोमाजी उस्ताद 
बनता है बलवन 
हाय, हाय!! 
यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय। 
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब 
साफ़ उभर आया है, 
छिपे हुए उद्देश्य 
यहाँ निखर आये हैं, 
यह शोभायात्रा है किसी मृत-दल की। 
विचारों की फिरकी सिर में घूमती है 
इतने में प्रोसेशन में से कुछ मेरी ओर 
आँखें उठीं मेरी ओर-भर 
हृदय में मानो कि संगीन नोंकें ही घुस पड़ीं बर्बर, 
सड़क पर उठ खड़ा हो गया कोई शोर-- 
"मारो गोली, दाग़ो स्साले को एकदम 
दुनिया की नज़रों से हटकर 
छिपे तरीक़े से 
हम जा रहे थे कि 
आधीरात--अँधेरे में उसने 
देख लिया हमको 
व जान गया वह सब 
मार डालो, उसको खत्म करो एकदम" 
रास्ते पर भाग-दौड़ थका-पेल!! 
गैलरी से भागा मैं पसीने से शराबोर!! 

एकाएक टूट गया स्वप्न व छिन्न-भिन्न हो गये 
सब चित्र 
जागते में फिर से याद आने लगा वह स्वप्न, 
फिर से याद आने लगे अँधेरे में चेहरे, 
और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक 
गहन मृतात्माएँ इसी नगर की 
हर रात जुलूस में चलतीं, 
परन्तु दिन में 
बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र 
विभिन्न दफ़्तरों-कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में। 

हाय, हाय! मैंने उन्हे दैख लिया नंगा, 
इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।