Monday, October 31, 2011

बाढ़ और पेड़


जब शैतानी आंधी दौड़ पड़ी 
और क्रूर किनारे उगलने लगे बाढ़ का काला पानी 
हमारी प्यारी हरी-भरी धरती पर 
शैतान हुंकारने लगा हवाओ में 
वह पेड़ गिर पड़ा 
उस पेड़ को गिरा दिया गया 
उसका विशाल तना तोड़ दिया 
आंधी ने 
वह पेड़ मर गया 

पेड़, क्या तुम मर सकते हो 
छोटी लाल नदी ने पुछा 
तुम्हारी जड़ें सिंची गयी हैं 
शराबों से 
जो निकाली गयी हैं 
नरम शाखाओं से 
प्यारे पेड़ 
अरब की जड़ें 
कभी मरती नहीं 
वे गहरे जाती हैं 
पत्थरों से भी नीचे 
और धरती की गहराई में 
अपना रास्ता बना लेती हैं 
पेड़, ओ पेड़ 
तुम फिर उगोगे 
तुम्हारी कोंपले फूटेंगी 
हरी हरी और रसीली 
सूरज की रोशनी में 
खुशियों की घंटियाँ
पत्तों में बजेंगी 
सूरज तक अपनी आवाज पहुंचाएगी 
और लावा पक्षी 
लोट आयेंगे 
अपने घर 
अपने घर
अपने घर 

फदवा तुकन 

Thursday, October 27, 2011

This World



 
My own planet, my Earth,
      My globe spinning through space!
By the sun’s flaming hands
      You were launched on your race.

On his wheel your moist clay
      He lovingly threw
And with tender caresses
      Gave life unto you.

In the kilns of the cosmos
      Where cosmic storms blaze
You were fired and were tempered
      And coaled with glaze.

When at last you were finished
      And fired, shining new,
The sun poured the oceans
      And seas onto you.

With dawns and with sunsets
      He painted you too,
Then washed you with showers
      He sent from the blue
O’er the firmament wide
      He then stepped aside,
Looked down on his masterpiece,
      Beaming with pride.



For that globe was just perfect,
          No more and no less
And the potter was happy
          At such a success.

Through distant mists shining
      On the planet he smiled,
Then gave it to Man,
      Saying: "Take it, my child!

“Take care not to break it,
      For surely, I feel,
I’ll never repeat it
      On my potter’s wheel!”

Translated by Louis Zellikoff


SEMYON KIRSANOV

Saturday, October 1, 2011

स्मृति से प्रेरणा

जिंदगी के हालात को बदलने की सतत प्रक्रिया के दौरान, स्मृति हमारी मति को समृद्ध करती है और फिर प्रज्ञा आलोकित होती है. प्रज्ञा फिर हमारी मति को समृद्ध करती है और मति फिर स्मृति को ज़रूरी मार्गदर्शन के लिए टटोलती हुयी उसका नवीनीकरण करती है और इस क्रम को हर बार उन्नततर धरातल पर दोहराया जाता है. 
(बिगुल, मई २०१० से साभार)